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तर्क एवं जीव विज्ञान, दोनों की उपेक्षा

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Summary

अगर कुछ देखे जाने का प्रमाण दर्जित नहीं है, तो यह उसके अस्तित्व को नकार देने का पर्याप्त कारण नहीं होता

Full Article

कई संचार माध्यमों के अनुसार, हाल ही में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, डॉ. सत्यपाल सिंह ने अखिल भारतीय वैदिक सम्मलेन, औरंगाबाद (महाराष्ट्र), में संवाद-दाताओं से बातचीत करते हुए क्रम-विकास (evolution) के सिद्धांत को ख़ारिज कर दिया (यहाँ, यहाँ, यहाँ, यहाँ)। मंत्री जी के कार्यालय ने ट्विटर पर (@OfficeOfSPS) इन टिप्पणियों का एक वीडियो भी जारी किया है। डॉ. सिंह ने कहा कि पिछले हज़ारों- लाखों सालों में हमारे पूर्वजों ने यह कहीं नहीं लिखा या कहा है कि उन्होंने जंगल या शहर में किसी बंदर को मानव में बदलते हुए देखा। क्योंकि किसी ने कभी बंदर को मानव में बदलते हुए नहीं देखा, इसलिए, डॉ. सिंह के अनुसार, क्रम-विकास के बारे में डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है। उनका मानना है कि मनुष्य अपने मौजूदा रूप में ही पृथ्वी पर आया है और हमेशा वैसा ही रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे स्कूल और कॉलेज शिक्षण को बदलना चाहिए ताकि इस तथ्य को दर्शाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि कई लोग यह नहीं जानते, विदेशी वैज्ञानिकों ने करीब ३५ साल पहले ही यह प्रमाणित कर दिया था कि क्रम-विकास के सिद्धांत में कोई सच्चाई नहीं है।

 

डॉ. सिंह के ये तर्क कई प्रकार से गलत हैं, और तर्कशास्त्र एवं जीव विज्ञान, दोनों के सिद्धांतों की उपेक्षा करते हैं। पहली बात यह है कि क्रम-विकास के बुनियादी तथ्यों को, और मानव क्रम-विकास के इतिहास को, दुनिया भर के वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। विज्ञान के अन्य क्षेत्रों की तरह, क्रम-विकास के भी सूक्ष्म बिंदुओं पर जैव वैज्ञानिकों में मतभेद है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि क्रम-विकास के डार्विनियन दृष्टिकोण के बुनियादी सिद्धांतों पर किसी भी प्रकार का कोई वैज्ञानिक विवाद है। ऐसा कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि क्रम-विकास पर डार्विन का विवरण गलत है। कई भारतीय और विदेशी वैज्ञानिकों ने क्रम-विकास की वजह से हुए परिवर्तन और नए उपप्रजातियों (incipient species) के बनने की प्रक्रिया को प्रयोगशाला में दर्शाया हैं। मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि ३५ साल पहले ऐसा कौन सा प्रमाण पेश किया गया था जिसने, मंत्रीजी के अनुसार, क्रम-विकास को खारिज कर दिया। मैं केवल अनुमान लगा सकता हूं कि डॉ. सिंह १९७० के दशक की ‘विरामित संतुलन‘ वाली बहस की बात कर रहे थे जो कि महज़ एक तकनीकी मसला था। इसके अंतर्गत वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि विकासवादी परिवर्तन आमतौर पर धीमा और अपेक्षाकृत निरंतर है, या तेज़ और अपेक्षाकृत लंबी अवधि में विभक्त। अगर मंत्रीजी वाकई इस विवाद के बारे में बात कर रहे थे, तो जाहिर है कि वे इस मसले को समझ नहीं पाए हैं। इसके अलावा, अगर किसी ने एक चीज़ को देखने का कोई दावा नहीं किया है, तो इससे यह नहीं मान सकते की उस चीज़ का कोई अस्तित्व ही नहीं है। इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि डॉ. सिंह के अनुसार हमारे पूर्वज बंदरों को मनुष्यों में बदलते हुए देख सकते थे और उन अनुभवों को लिखने की क्षमता रखते थे। परन्तु जब तक हमारे पूर्वजों में लिखने की क्षमता आई, तब तक तो वे मनुष्य में बदल चुके थे, तो फिर बंदर से मनुष्य में बदलाव को वे कैसे देख पाते? डार्विन के विकासवादी दृष्टिकोण को बंदरों के मानव बनने से भ्रमित करना अपने आप में ही एक बड़ी गलती है। विकासवादी जीव विज्ञान हमें बताता है कि मनुष्य और बंदरों समेत सभी वानर प्रजातियां (species) अपेक्षाकृत हाल के विकासवादी (evolutionary) इतिहास में एक समान पूर्वज से उत्पन्न हुई हैं। इसके लिए बहुत सारे सबूत मौजूद हैं, जैसे कि हमारी विकासवादी वंशावली (lineage) का डीएनए अनुक्रम (DNA sequence) और आणविक जन-संख्य आनुवंशिकी (molecular population genetics) के सिद्धांत। मज़े की बात यह है कि ये वही सिद्धांत हैं जो बायो-मेडिकल जीनोमिक्स (bio-medical genomics) की नींव हैं, जिसके प्रोत्साहन में हमारी सरकार भारी निवेश करती है।

 

माननीय मंत्रीजी का बयान इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि अनेक भारतीय वैज्ञानिकों ने, डार्विनियन प्रतिमान (paradigm) के भीतर, विकासवादी जीव विज्ञान की प्रगति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय विकासवादी जैव वैज्ञानिकों ने विविध विषयों में अवधारणात्मक (conceptual) और व्यवहारिक (empirical) योगदान दिया है, जिनमें शामिल हैं: पौधों और कीड़ों का सहक्रियाकरण (plant-insect coevolution), जनक-संतति संघर्ष (parent-offspring conflict), संकरण और जाति-गठन (hybridization and race formation), सामाजिकता का विकास (evolution of sociality), प्रतिस्पर्धी क्षमता का विकास (evolution of competitive ability), उप-महाद्वीप में पशु वंशों का विकासवादी इतिहास (evolutionary history of animal lineages in the sub-continent), जीनोम स्तर की लैंगिक संघर्ष (genome-level sexual conflict) और सदैव बदलते हुए वातावरण में क्रम-विकास (evolution in fluctuating environments)। अभी पिछले साल ही, भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology) ने भारतीय विकासवादी जैव वैज्ञानिकों के क्रम-विकास सिद्धांत-संबंधी मूल योगदान का उल्लेख करते हुए उसे सराहनीय बताया था।

 

इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज और इंडियन नैशनल साइंस एकेडमी २००६ के अंतर्राष्ट्रीय इंटर-एकेडमी पैनल द्वारा पारित ‘Statement on the Teaching of Evolution’ (क्रम-विकास की शिक्षा पर वक्तव्य) के हस्ताक्षरकर्ता हैं, जो दुनिया भर की ६७ विज्ञान अकादमियों द्वारा समर्थित है। इस वक्तव्य की शुरुआत में अकादमियाँ कुछ इस प्रकार से अपनी चिंता व्यक्त करती हैं: “हम, विज्ञान की अधोनीकृत अकादमियों, ने यह अनुभव किया है कि विश्व भर की कुछ सार्वजनिक शिक्षा प्रणालियों में, वैज्ञानिक साक्ष्यों, आंकड़ों, और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और क्रम-विकास के परीक्षण-योग्य सिद्धांतों को कुछ ऐसे सिद्धांतों से छिपाया, अस्वीकार या भ्रमित किया जा रहा है जो कि विज्ञान द्वारा परीक्षण योग्य नहीं हैं। हम निर्णयकर्ताओं, शिक्षकों और अभिभावकों से आग्रह करते हैं कि वे सभी बच्चों को विज्ञान के तरीकों और खोजों के बारे में प्रशिक्षित करें, और उनमें प्रकृति के विज्ञान की समझ को बढ़ावा दें। प्राकृतिक दुनिया का ज्ञान लोगों को मानवीय ज़रूरतें पूरा करने और पृथ्वी की सुरक्षा करने की क्षमता देता है।

हम पृथ्वी और जीवन की उत्पत्ति और विकास के बारे में निम्नलिखित सबूत-आधारित तथ्यों को स्वीकार करते हैं, जो कि कई अवलोकनों (observations) और विभिन्न वैज्ञानिक विषयों के स्वतंत्र प्रयोगात्मक परिणामों (empirical results) द्वारा स्थापित किए गए हैं। भले ही विकासवादी परिवर्तन के अति-तकनीकी सूक्ष्म और सटीक विवरण के बारे में कई खुले प्रश्न हैं, पर कोई भी वैज्ञानिक सबूत इन brihad परिणामों का खंडन नहीं करते हैं:

१. इस ब्रह्मांड में, जो कि ११ से १५ अरब सालों में अपने वर्तमान रूप में विकसित हुआ है, हमारी पृथ्वी क़रीब ४.५ अरब साल पहले उत्पन्न हुई।

२. इसके बाद से, कई भौतिक और रासायनिक बलों के प्रभाव से, पृथ्वी के भूतत्त्व और वातावरण निरंतर बदलते रहे हैं।

३. पृथ्वी पर जीवन कम से कम २.५ अरब साल पहले उत्पन्न हुआ। प्रकाश संश्लेषक (photosynthetic) जीवों के तेज़ विकास के बाद, कम से कम २ अरब साल पहले, वातावरण में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा संचित हुई। प्रकाश संश्लेषण की यह प्रक्रिया, ऑक्सीजन (प्राणवायु) के साथ-साथ, निश्चित ऊर्जा और भोजन का भी मूल स्रोत है, जिस पर मनुष्य जीवन पूर्णतः निर्भर करता है।

४. पृथ्वी पर जीवन की पहली उत्पत्ति के बाद से कई और प्रकार के जीव विकसित होते रहे हैं, जिनके क्रम-विकास की पुष्टि जीवाश्मिकी विज्ञान (palaeontology) और आधुनिक जैव और जैव-रासायनिक विज्ञान द्वारा स्वतंत्र रूप से होती रही है। मनुष्य सहित सभी वर्तमान जीवों के आनुवंशिक कोड (genetic code) की संरचना में सामान्यताऐं, स्पष्ट रूप से उनके समान-मूल उत्पत्ति को दर्शाती हैं।”

 

सृजनवादियों (creationists) द्वारा बनाई गई कई वेबसाइटें, ख़ासकर अमेरिका में, नियमित रूप से विकासवादी जीव विज्ञान को एक ऐसे सिद्धांत के रूप में पेश करने का प्रयास करती हैं, जिसका वैज्ञानिक समुदाय में व्यापक समर्थन नहीं है। डॉ. सिंह की सोच को साझा करने वाले कई लोग (@rammadhavbjp) ट्वीट्स में ऐसी साइटों का सन्दर्भ देते हुए इस बात का समर्थन करते हैं कि क्रम-विकास एक वैज्ञानिक रूप से अस्वीकृत धारणा है। इन ट्वीट्स में दिए गए सन्दर्भों में से गुमराह करने वाले एक लेख का शीर्षक है “५०० वैज्ञानिकों को डार्विन के विकास के सिद्धांत पर संदेह”। जबकि वास्तविकता में यह लेख एक पुराने सन्दर्भ से उन वैज्ञानिकों की बात कर रहा है जिन्होंने इस बयान पर हस्ताक्षर किए हैं: “हमें जीवन की जटिलता के बारे में यादृच्छिक उत्परिवर्तन (random mutation) और प्राकृतिक चयन (natural selection) की क्षमता के दावों पर संदेह है। डार्विन के सिद्धांत संबंधित प्रमाण की सावधानीपूर्ण जांच को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए”। कई दूसरे वैज्ञानिकों ने इस लेख की आलोचना की है। ऐसी साइटें एक संकीर्ण तकनीकी तर्क – छोटी भिन्नताओं पर प्राकृतिक चयन बनाम उत्परिवर्तनीय अभिनति (mutational bias) का क्रम-विकास पर असर – का सहारा लेकर पूरे डार्विनियन प्रतिमान को अस्वीकृत के रूप में चित्रित करने का प्रयास कर रही हैं। ऐसी सृजनात्मक साइटों को देखकर गुमराह होना संभव है, पर उम्मीद यह थी कि ऐसे निष्कर्ष (कि क्रम-विकास ख़ारिज किया जा चुका है और हमारे पाठ्यक्रम को तदनुसार बदलना चाहिए) पर पहुँचने से पहले डॉ. सिंह ने भारत के किसी भी विकासवादी जैव वैज्ञानिक को पूछने का कष्ट किया होता, जो कि अधिकतर एम.एच.आर.डी. (MHRD) या डी.एस.टी. (DST) समर्थित संस्थानों में काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज (बेंगलुरु), नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, भारत (इलाहाबाद) और भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (नई दिल्ली) ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है: “भारत की तीनों विज्ञान अकादमियाँ यह स्पष्ट कर देना चाहती हैं कि मंत्रीजी के बयान का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विकासवादी सिद्धांत, जिसमें डार्विन ने मौलिक योगदान दिया था, अच्छी तरह से स्थापित है। क्रम-विकास के मूल तथ्यों को लेकर कोई वैज्ञानिक विवाद नहीं है”। कई वैज्ञानिकों, शिक्षकों और छात्रों ने भी एक याचिका पर हस्ताक्षर कर माननीय मंत्रीजी से अपनी टिप्पणी वापस लेने की मांग की है।

 

विकासवादी जीव विज्ञान न सिखाए जाने के व्यावहारिक परिणाम भी हैं। अगर हम विकासवादी जीवविज्ञान के डार्विनियन प्रतिमान को अस्वीकार कर दें, तो एक उदाहरण के तौर पर, जीवाणुओं (bacteria) में बहु-औषधि प्रतिरोध के विकास (evolution of multi-drug resistance) जैसी सामाजिक चुनौतियों का अध्ययन और उपचार करने की हमारी क्षमता भी गंभीर रूप से प्रभावित हो जाएगी।

 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा दुख की बात यह है कि डॉ. सिंह न केवल खुद विज्ञान (रसायन शास्त्र में एम.एस.सी. और एम.फिल.) में प्रशिक्षित हैं, बल्कि वे देश में उच्च शिक्षा की देखरेख वाले मंत्रालय के राज्यमंत्री भी हैं। उनके मंत्रालय की जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए, यह ग़ौरतलब है कि ये उस व्यक्ति के विचार हैं जो शैक्षिक और अनुसंधान प्राथमिकताओं और एजेंडा को सीधे प्रभावित करने में समर्थ हैं। माननीय मंत्रीजी का यह बयान, कि जीव विज्ञान की एक बहुमान्य अवधारणा “वैज्ञानिक रूप से गलत” है और इसे इसके वर्तमान रूप में न पढ़ाया जाए, वास्तव में डरावना है, खासकर जब वह अपनी गलती स्वीकार करने को भी राज़ी नहीं हैं। आज क्रम-विकास, कल क्या, क्वांटम भौतिकी (quantum physics) और आणविक अनुवांशिकी (molecular genetics), को लेकर ऐसी बातें की जाएँगी, जिनके बारे में भी, संभवतः हमारे पूर्वजों ने कुछ नहीं लिखा था!

 

अमिताभ जोशी बेंगलुरु के जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिकी अनुसंधान केंद्र (JNCASR) में प्रोफेसर हैं, और इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज (बेंगलुरु), नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, भारत (इलाहाबाद) और भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (नई दिल्ली) के फेलो हैं। प्रोफ़ेसर जोशी जे. सी. बोस नेशनल फेलो भी हैं, और शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (जैविक विज्ञान: 2009) एवं लक्ष्मीपत सिंघानिया नेशनल लीडरशिप अवार्ड (यंग लीडर, साइंस एंड टेक्नोलॉजी: 2010) से पुरस्कृत किए जा चुके हैं। वे पिछले 30 वर्षों से इवोल्यूशनरी जीव विज्ञान का अध्ययन, शोध और शिक्षण कर रहे हैं।

अभिषेक मिश्र IISER पुणे में विकासवादी जीव विज्ञान में पीएचडी कर रहे हैं।

 

अस्वीकरण: तीनों अकादेमियों के बयान तथा याचिका के बयान के लिए नए लिंक दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त यदि मूल अंग्रेज़ी लेख और उसके हिंदी अनुवाद के बीच कोई विसंगति है, तो मूल अंग्रेज़ी संस्करण को स्वीकार किया जाना चाहिए।

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